वट सावित्री पूजा क्या है? सावित्री पूजा बिधि | पूजन सामग्री | व्रत कथा

Vat Savitri Puja – नमस्कार दोस्तो, गंगाज्ञान पर आप सबो का फिर से स्वागत है। जैसा कि हम सब जानते है हमारी भारतीय संस्कृति बहुत ही पुरानी और अखण्ड संस्कृति है। भारत मे पूजा पाठ, पर्व त्योहार ,व्रतकथा का बहुत ही प्रचलन है। हमारे देश भारतवर्ष में बहुत प्रकार के पर्व और त्योहार मनाये जाते हैं। लोगों का इन पर बहुत ही विश्वास रहता है सदियों से लोग पूजा पाठ को महत्व देते आये हैं। लोग ईश्वर में बहुत ही श्रद्धा और विश्वास रखते है। इन्ही व्रतों में से एक व्रत है वट सावित्री पूजा ।

वट-सावित्री

आज के इस आर्टिकल में हम वट सावित्री पूजा क्यों किया जाता है पूजा विधि क्या है? इत्यादि इन्ही सब बातों की चर्चा करेंगे। तो चलिए शुरू करते है-

वट सावित्री पूजा क्या है ?

हिन्दू धर्म मे वट वृक्ष का खास महत्व है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह वृक्ष बहुत ही गुणकारी और महत्वपूर्ण माना जाता है । वट सावित्री पूजा माता सावित्री देवी और उनके पति श्री सत्यवान जी की व्रत कथा है। पौराणिक कथा के अनुसार वट बृक्ष के नीचे माता सावित्री देवी ने बहुत ही चतुराई से अपने पति सत्यवान के प्राण को यमराज से वापस लाई थी।

इसलिए वट वृक्ष की पतो और लताओं में माता सावित्री देवी का वास माना जाता है। वट सावित्री पूजा समस्त सुहागिन नारियो द्वारा अपने पति की दीर्धायु और संतान सुख के लिए की जानी वाली पूजा है।

वट सावित्री पूजा कब होती है?

वट सावित्री पूजा हिंदी महीने के अनुसार ज्येष्ठ महीने के अमावस्या के दिन होती है। वट सावित्री पूजा उत्तरी ,पश्चिमी , और पूर्वी भारत और नेपाल में अमावस्या के दिन करते है। इसी दिन सावित्री माता ने अपने मरे हुए पति को जीवित किया था । इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ पूजा सामग्री , फल , नैवैद्य इत्यादि लेकर वट वृक्ष के पास माता सावित्री और सत्यवान की पूजा करते हैं।

साथ ही गणेश भगवान और मा गौरा के साथ साथ ब्रह्मा, विष्णु , महेश इत्यादि देवताओं की भी पूजा की जाती है। क्योंकि वट (वरगद) वृक्ष में इन तीनो देवताओ का वास होता है। वट वृक्ष की पूजा करने से तीनों देवता प्रसन्न होते है और सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

लेकिन दक्षिणी भारतीय महिलाएं ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट सावित्री पूजा करती है। जो अमावस्या के 15 दिन बाद आता है। वट सावित्री की कथा दक्षिणी भारत से जुड़ा हुआ है। सबसे पहले दक्षिणी भारतीय महिलाओं ने वट सावित्री पूजा करना प्रारंभ किया था । धीरे धीरे इसका प्रचलन पूरे भारत, नेपाल और अन्य देशों में भी होने लगा है।

वट सावित्री पूजा शुभ मुहूर्त 2020 ज्येष्ठ अमावस्या

21 मई 2020 – शाम 9:35 से शुरु और 22 मई 2020 सुबह 11:35 तक

पूजा प्रारम्भ – 22 मई 2020 दिन शुक्रवार

वट सावित्री पूजा सामग्री में क्या क्या लें?

वट सावित्री पूजा में प्रयोग होने वाले सामग्रियां इस प्रकार हैं –

  • काले अंकुरित चने (फेरे करने और चढ़ाने के लिए)
  • 2 कच्चा सूत (फेरे देने और 2 माला बनाने के लिए)
  • कच्चे सुत को 12 बार लपेटकर दो माला बना ले
  • चावल के आटे और हल्दी का घोल (बांस की टोकरी और बांस के पंखे में ऐपन लगाने के लिए)
  • हल्दी का घोल ( माला रँगने के लिए)
  • प्रसाद (पूरी हलवा)
  • बर्गदा (गुलगुला)
  • मिठाई
  • खरबूजे
  • फल
  • मीठी पूरी
  • बरगद के पते (सावित्री माता के गहने बनाने के लिए और अपने बालों में लगाने के लिए )
  • गंगाजल या जल ,फूल अष्टगन्धक तिलक
  • पिले अक्षत या तिल आटे या मिट्टी के दीपक
  • रोली
  • धुपबती, कपूर
  • गुगुलदासन, गुड़, घी, सिंदूर ,
  • पान सुपारी
  • नारियल
  • लौंग
  • इलायची
  • जनेऊ
  • रक्षा
  • इत्र
  • लाल कपड़ा
  • पीला कपड़ा
  • श्रृंगार के सामान
  • मीना
  • चुनरी
  • कच्चा दूध
  • पीला झंडा
  • दक्षिणा
  • दान सामग्री (सूती वस्त्र)

वट सावित्री पूजा विधी?

हिन्दू धर्म के अनुसार ज्येष्ठ माह के अमावस्या को वट यानि बरगद वृक्ष के नीचे माता सावित्री और सत्यवान की पूजा की जाती है। सारी सुहागिन स्त्रियां सुबह उठकर नित्य क्रिया से निवृत होकर आवलें या तिल के जल से स्नान आदि करके अपने पति के लिए दुल्हन की तरह श्रृंगार करके सभी पूजा सामग्रियों के साथ वट वृक्ष के पास जाकर पूजा करती है।

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वट वृक्ष को प्रणाम करके सत्यवान और सावित्री की मूर्ति स्थापित करते है। उन्हें लाल वस्त्र से सजाते हैं। जल, सुपारी , सिक्का, अक्षत फूल, लौंग ,इलायची , पान के पते , इत्र , गंगाजल हल्दी , चंदन इत्यादि डालकर कलश स्थापना करते हैं। गौरा गणेश की स्थापना करते है। साथ ही बरगद के पतो पर ब्रम्हा और सरस्वती , विष्णु और शिव जी का नाम लिखकर उन्हें भी बैठाते हैं। अब कलश स्नान कराकर कलश पूजा किया जाता है।

गणेश जी को जनेऊ पहनाये , फिर माता सावित्री और सत्यवान के साथ सभी देवताओं को स्नान कराकर कुमकुम, चंदन , अष्टगन्धक तिलक ,रोली ,अबीर , फूल बेलपत्र ,गुलाल , दुप दूध इत्यादि चढ़ाकर धूप दिप दिखाते है। वस्त्र, उपवस्त्र, श्रृंगार सामान, प्रसाद इत्यादि सब कुछ अर्पण करने प्रणाम करते हैं । फिर बांस के पंखे से सावित्री और सत्यवान को हवा करें , सभी देवताओं को हवा करें ।

बरगद के पतों को बालों में लगा ले 24 घंटे तक बालो में लगा रहने दे। फिर आँचल में खरबूजे , चूड़ी , बिंदी , बिछुआ ,बर्गदा ( बरगद के दो डंडी में 6 – 6 बर्गदा पिरोकर अंचल में रख ले फेरी लिए ) और चने इत्यादि लेकर फिरी किया जाता है। और धागा ( रक्षा या कच्चा सूत ) बाँधा जाता है।

इस धागे के साथ 3 बार या 7 बार या 12 बार वट वृक्ष की परिक्रमा किया जाता है। प्रत्येक परिक्रमा के क्रम में अपने पूजा स्थल के पास सत्यवान और सावित्री माता को आँचल भरा जाता है । फिर एक बार जल के साथ परिक्रमा किया जाता है जिसमे परिक्रमा के क्रम में जल का धार टूटना नही चाहिए। उसके बाद चुनरी में नारियल बांधकर वट वृक्ष में बांध दिया जाता है। झंडे भी वही लगा दिया जाता है।

वृक्ष की जटाओं में चुनरी भी बांधा जाता है। फिर हाथ मे पीले अक्षत या तिल ,फूल लेकर सावित्री और सत्यवान की कथा सुना जाता है। इसके बाद गुगुलदासान , कपूर , गुड़ और घी से हवन किया जाता है। उसके बाद गणेश जी ,सावित्री ,सत्यवान और सभी देवताओ की आरती की जाती है। उसके बाद ब्राह्मणों को दान दक्षिणा और प्रसाद देना बहुत ही शुभ माना जाता है ।

बिना दान के पूजा सफल नही माना जाता है। एक धागे के माला को किसी अन्य स्त्री या मा गौरा से अदल बदल कर 24 घंटे तक पहने रहें। अंत मे यदि सम्भव हो तो वट वृक्ष की 108 बार परिक्रमा कर सकते है। फिर प्रणाम करके अपने सामग्री उठा सकते है । इस प्रकार वट सावित्री पूजा सम्पन्न किया जाता है।

वट सावित्री व्रत कथा

माता सावित्री पतिव्रता नारी थी । सावित्री माता सरस्वति का ही रूप है। सावित्री का जन्म भद्र देश मे हुआ था। जो अब दक्षिणी भारत है। वहाँ पर अश्वपति नाम के राजा थे । उनके कोई संतान नही था । तब उन्होंने यज्ञ करके बेटी के रुप में तेजस्वी सावित्री को प्राप्त किया। जब वह बड़ी हो गई तो राजा ने उसे स्वयं वर ढूंढने को कहा। पिता की आज्ञा मानकर सावित्री मंत्रियों के साथ यात्रा पर निकल गई। यहां वहां जंगल इत्यादि घूमने के बाद वह पिता के पास आई उस समय नारद जी भी वहाँ पधारे थे। सावित्री ने दोनों को प्रणाम किया ।

पिता ने सावित्री से उसके यात्रा के बारे में पूछा । सावित्री बोली पिताजी तपोवन में अपने माता पिता के साथ रह रहे सत्यवान मेरे लिए योग्य है। मैने मन से उन्हें अपना पति मान लिया है। सावित्री की बात सुनकर नारद जी बोले – हे राजन , सावित्री ने तो भूल कर दी है । तब राजा ने नारद जी पूछा कि ऐसा क्या अवगुण है सत्यवान में । तब नारद जी बोले – सत्यवान का पिता साल्व देश का द्युतमसेन नाम का राजा है।

जो शत्रुओ के द्वारा राज्य से वंचित कर दिए गये हैं। वे वन में तपस्वी के भांति जीवन व्यतीत कर रहे हैं और अपनी दृष्टि पति पत्नी दोनों खो चुके है साथ ही सत्यवान भी अल्पायु है। 12 वर्ष की आयु में से सिर्फ एक वर्ष शेष रह गए हैं । तब राजा डर गए और सावित्री को विवाह न करने के लिए समझाने लगे। तब सावित्री ने कहा कि पिता जी नारी अपने जीवन मे केवल एक ही पति का वरण करती है इसलिए मैं किसी दूसरे को पति नही बना सकती । तब राजा ने बेटी की हट के आगे विवश होकर उसका विवाह बड़ी ही धूमधाम से सत्यवान के साथ कर दिया। सावित्री अपने पति और सास ससुर के साथ वन में रहने लगी । पति और सास ससुर की सेवा करना उसका धर्मकर्तव्य बन गया था ।

लेकिन जैसे जैसे समय बीत रहा था सावित्री को नारद जी की बात कि मेरा पति अल्पायु है को लेकर चिंता बढ़ती जा रही थी। नारद जी कहे अनुसार जब सत्यवान की आयु 4 दिन की बची तब सावित्री ने 3 दिन पहले व्रत रखना शुरू कर दिया । देखते देखते चौथा दिन भी आ गया जब सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी । उस दिन जब सत्यवान लकड़िया लेने जा रहा था तब सावित्री ने साथ चलने की जिद्द की । सत्यवान के मना करने पर भी वह सास ससुर से आज्ञा लेकर अपने पति के साथ वन को चली गई । वन में सत्यवान ने जैसे ही लकड़ी पर प्रहार किया उसे असहनीय दर्द होने लगी। वह तुरंत वृक्ष से नीचे उतर गया । सावित्री समझ गई कि उसके पति का अंत समय आ चुका है।

अतः उसने वट वृक्ष के नीचे अपने पति का सर अपने गोद में रखकर बैठ गई ।सत्यवान आराम करते हुए सो गया। । सावित्री ईश्वर से प्राथना कर ही रही थी कि तभी उसने लाल वस्त्र पहने भयंकर आकृति वाला एक पुरुष को सामने खड़ा देखा । सावित्री बोली कि आप कौन हैं । तब वह पुरुष बोले कि मैं यमराज हूँ और तुम्हारे पति के प्राण लेने आया हूँ । तब सावित्री ने कहा कि प्रभु सांसारिक प्राणियों को लेने तो आपके दूत आते है ,क्या कारण है कि आपको स्वयं आना पड़ा । तब यमराज बोले – सत्यवान एक धर्मात्मा और गुणों का सागर है ,मेरे दूत इन्हें ले जाने के योग्य नही है इसलिए मुझे स्वयं आना पड़ा ।

ऐसा कहकर यमराज ने सावित्री के पति के प्राण निकालकर दक्षिण दिशा की ओर यमलोक ले जाने लगे । तब सावित्री भी उनके पीछे जाने लगी । उसे पीछे आता देख यमराज ने कहा सावित्री तुम कहा कहा जा रही हो। साबित्री बोली – मेरे पति जहाँ जाएंगे मैं भी वही जाऊंगी यही मेरा धर्म है। उसके पति व्रता धर्म को देखकर यमराज ने पति के प्राण के बदले कोई भी दूसरा वर मांगने को कहा। सावित्री ने अपने अंधे माता पिता की आंखें मांगी यमराज ने कहा – तथास्तु । फिर यमराज जाने लगे ,सावित्री भी पीछे जाने लगी।

जब यमराज मुड़कर देखे की सावित्री फिर पीछे पीछे आ रही है तब उन्होंने फिर एक और वर मांगने को कहें । तब सावित्री ने सास ससुर के छीने हुए राज्यो को मांग लिया। यमराज बोले – तथास्तु । तब यमराज आगे बढे और जाने लगे सावित्री फिर भी पीछे ही आ रही थी । और यमलोक के तरफ यमराज के पीछे पीछे बढ़ने लगी। तब यमराज बोले एक और वर मांग लो और लौट जाओ तुम यमपुरी नही चल सकती। तब सावित्री ने अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान मांग लिया। यमराज ने बोल दिए – तथास्तु ।

यमराज आगे बढे और जाने लगे ।सावित्री फिर भी उनका पीछा नही छोड़ी और पीछे पीछे जाने लगी। तब यमराज ने तैस में आकर कहा देखो सावित्री यमलोक में तुहारा जाना ठीक नही है तुम अपने पति के प्राण बदले कोई भी वर मांग लो और लौट जाओ। तब सावित्री ने सत्यवान से अपने 100 पुत्र प्राप्ति का वर मांग लिया ।यमराज ने बिना सोचे तैस मे फिर बोल ही दिए – तथास्तु बोलकर जाने लगे सावित्री भी पीछे पीछे जाने लगी तब यमराज बोले मैने तुम्हे सारे वरदान प्रदान किये और अब तुम लौट जाओ। सावित्री बोली – प्रभु आपने मुझे सत्यवान से मेरे 100 पुत्र होने का वरदान दिया है और सत्यवान के बिना पुत्र कैसे संभव होगा।

ऐसा कहकर सावित्री ने यमराज को सोचने पर मजबूर कर दिया तब यमराज हँसे औऱ उसकी चतुराई औऱ पतिव्रता धर्म को देखकर सत्यवान के प्राण छोड़ दिये और साथ साथ यह आशीर्वाद दिए कि तुम्हारी यह कहानी युगों युगों तक सुनाई जाएगी। और तुम्हारे और सत्यवान की इसी वट वृक्ष के नीचे पूजा की जाएगी। जो सुहागिन स्त्रियां तुम्हारा और सत्यवान की पूजा करके तुमसे आशीर्वाद प्राप्त करेगी उसे मनवांछित फल प्राप्त होगा ।

उसका पति दीर्घायु होगा ,उसे संतान सुख की प्राप्ति होगी जीवन के सभी दुःख दूर होंगे। इतना कहकर यमराज अंतर्ध्यान हो गये । इस तरह बड़ी ही चतुराई से सावित्री ने अपने पति के प्राण यमराज से छुड़ा कर वापस लाई और सत्यवान को पुनः जीवित कर दिया। इसलिए सदियों से चली आ रही वट सावित्री पूजा आज भी सारी सुहागिन महिलाओ द्वारा किया जाता है।

वट सावित्री व्रत कैसे खोले?

पूजा समापन होने के बाद अपने समान को लेकर घर आते हैं । फिर आप अपने पति के पाव धोकर उन्हें प्रणाम करके आशीर्वाद ले और उसी पंखे से पति को भी हवा कर दें । उसके बाद ही प्रसाद ग्रहण करे सिर्फ एक बार ही मीठा और शुद्ध अन्न ग्रहण करे। कुछ स्त्रियां दिन में ही फलाहार से व्रत खोलती है। और अगले दिन सुबह स्नान, पूजा आदि के बाद ही अन्न ग्रहण करती हैं।

लेकिन कुछ स्त्रियां सूरज ढलने के बाद फलाहार से या मीठे भोजन से व्रत खोलते हैं और सुबह स्नान और पूजा के बाद ही अन्न ग्रहण करती है। पूजा के दिन किसी भी स्त्री को नमकीन जैसा अन्न ग्रहण नही करना चाहिए। जो स्त्रियां ऐसा करती हैं। उनका व्रत टूट जाता है। इस व्रत को करने के लिए बहुत ही सावधानियां बरतनी पड़ती है। और पूरी तरह से शुद्ध होकर पूजा को पूरा किया जाता है। जो स्त्री इस व्रत को पूरी श्रद्धा और भक्ति से पूरा करती हैं उन्हें मनचाहा फल प्राप्त होता है।

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