Somvati Amavasya Puja in Hindi- सोमवती अमावस्या पूजा कैसे करे?

Somvati Amavasya Puja Kaise Kare? नमस्कार दोस्तो, गंगाज्ञान पर आप सब का एक बार फिर से स्वागत है। आज के इस पोस्ट में हम आपको Somvati Amavasya Puja Kaise Kare? (मौनी अमावस्या पूजा) के बारे में बताने जा रहे हैं। जो की सोमवती अमावस्या पूजा के बारे में पूरी जानकारी हिंदी में विस्तार पूर्ण आप सब को मिलने वाली हैं।

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अगर आप भी Somvati Amavasya Puja Kaise Kare? के बारे में जानना चाहते है तो आप हमारे इस पोस्ट को जरूर पढ़े और दोस्तों के साथ शेयर करे। भारतीय संस्कृति के अनुसार भारत मे अनेको प्रकार के व्रत और पूजा अर्चना किया जाता है और सभी का अपना अलग ही महत्व होता है। लेकिन सोमवती अमावस्या पूजा और व्रत का सुहागिन महिलाओं के जीवन मे बहुत ही खाश महत्व होता है।

Somvati Amavasya Puja Kaise Kare? तो चलिए आज हम बताने जा रहे है कि सोमवती अमावस्या व्रत क्या होता है? Somvati Amavasya Puja Kaise Kare? सोमवती अमावस्या पूजा कब किया जाता है। पूजा में क्या क्या सामग्रियों की आवश्यक होती है? सम्पूर्ण पूजा विधी क्या है? व्रत कथा क्या है? व्रत के दिन क्या बिल्कुल भी नही करना चाहिए ? व्रत का पारण कैसे किया जाता है?

यदि आप भी जानना चाहते है सोमवती अमावस्या पूजा के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते है तो यह आर्टिकल जरूर पूरा पढ़िए और अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये ।

Somvati Amavasya Puja Kaise Kare? और (मौनी पूजा) किसे कहते है?

सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहा जाता है। इस दिन वट वृक्ष की पूजा अर्चना और व्रत करने का बहुत ही बड़ा विधान और महत्व है। सोमवार अमावस्या के इसी व्रत को सोमवती अमावस्या पूजा कहा जाता है। इस दिन कुछ भी न बोलने का प्रावधान रहता है। या बहुत कम बोला जाता है। इसलिए इसे मौनी अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन वट वृक्ष के पास जाकर भगवान शिव और विष्णु जी की पूजा की जाती है ।

कहा जाता है कि वट वृक्ष के मूल में भगवान विष्णु, तने में शिवजी और शाखाओं में ब्रह्माजी का वास होता हैं। साथ ही सोमवार शिवजी का वार होता है इसलिए इस दिन भगवान शिव की वट वृक्ष के नीचे पूजा अर्चना करने से लाभ मिलता है। इस दिन शनिदेव की भी वट वृक्ष के नीचे मंत्रजाप किया जाता है।

साथ ही वट वृक्ष की 108 सामग्रियों को रखकर एक एक करके 108 बार परिक्रमा की जाती है। और पूजा अर्चना की जाती है। जो सुहागिन महिलाएं सोमवती अमावस्या का व्रत करती है उन्हें सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

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अर्थात अपने पति की सलामती और दीर्घायु के लिए यह व्रत किया जाता है। इस व्रत को करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। सोमवती अमावस्या वर्ष में शायद ही कभी कभी एक या दो बार पड़ती है। ऐसा माना जाता है कि जब कौरव पांडव युद्ध मे कौरवों का नाश हो गया और सिर्फ पांडव ही बचे तब पांडव ने पितामह भीष्म से अपने राज्य के उत्थान और अपने वंशज को चलाने का उपाय पूछा।

तब भीष्म ने पांडवो को उनकी पत्नियों द्वारा सोमवती अमावस्या पूजा के करने और पीपल वृक्ष की 108 प्रकार की धन सामग्रियों से परिक्रमा करने का उपाय बताए और सोना धोबिन की कथा सुनने के लिए कहा तब पांडव ने सोमवती अमावस्या की पूजा विधि और व्रतकथा के बारे में विस्तार से पूछा लेकिन पांडव के पूरे जीवनकाल में किसी भी वर्ष में एक भी सोमवती अमावस्या का दिन नही आया और इसलिए उनका राज्य समाप्त हो गया।

लेकिन बहुत ही वर्षो के बाद सोमवती अमावस्या किसी वर्ष में एक , दो या तीन बार ही पड़ती है। इस वर्ष 2020 में पड़ने वाली सोमवती अमावस्या तिथि इस प्रकार है-

  • 20 जुलाई 2020, श्रावण अमावस्या , दिन- सोमवार , रात्रि 12:15 AM से 11:04 PM तक ।
  • 14 दिसंबर 2020, मार्गशीर्ष (माघ) अमावस्या, दिन – सोमवार , रात्रि 12:48 AM से 9 :48 PM तक।

सोमवती अमावस्या पूजा का महत्व

सोमवती अमावस्या पूजा के दिन मौन रहकर स्नान करने से सहस्त्र गाय दान के बराबर फल मिलता है इस दिन गंगानदी या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने से समस्त रोग और पापों से छुटकारा मिलता है सूर्य देव को हस्थजल से अर्घ्य देने से समस्त दरिद्रता का नाश होता है। तुलसी की 108 परिक्रमा करने से धन की प्राप्ति होती है। कुरुक्षेत्र के ब्रह्मसरोवर में स्नान करने से क्षत्रिय बल की प्राप्ति होती है।

इस दिन क्षिप्रा नदी में स्नान करके कुटुम्बकेश्वर के दर्शन करने से वंश की बृद्धि होती है। इस दिन तीर्थ, दान पूण्य करने से बहुत ही धन धान्य की प्राप्ति होती है। सोमवती अमावस्या पूजा करने से पितृदोष का निवारण भी होता है । इस दिन पितृजनों के नाम से कलावे का दीपक जलाकर दक्षिण दिशा की तरफ दीपक को अवश्य रखें। इससे हमारे पितृदेव खुश होते हैं। और उनके कृपा भी बनी रहती है। साथ ही इस दिन पितरो की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान का कार्य भी किया जाता है। यदि कोई अविवाहित कन्या इस व्रत को करती है तो उसे सौभाग्यशाली वर प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से सभी प्रकार के मनवांछित फल प्राप्त होता है।

सोमवती अमावस्या के दिन क्या क्या नही करें?

सोमवती अमावस्या व्रत के दिन व्रतकर्ताओ को मौन धारण करना चाहिए। अर्थात इस दिन ज्यादा बोलना नही चाहिए या सिर्फ जरूरी बातें ही बोले और गुस्सा , लड़ाई झगड़े भी न करे इस दिन विनम्र रहने का प्रावधान होता है। नियमानुसार पूजा पाठ को सम्पन्न करना चाहिए।

कपास के रुई और मूली का स्पर्श न करें इस दिन कलावे या कच्चे सूत की बत्ती का प्रयोग करें । कडुवा तेल न लगाएं,शैम्पू या मिट्टी से बाल न धोएं न ही साबुन का इस्तेमाल करें। लाल , गुलाबी, पीले और नारंगी रंग के रेशमी कपड़े धारण करें।

Somvati Amavasya Puja कब और कैसे किया जाता है?

सोमवती अमावस्या पूजा सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन सुबह में किया जाता है। इस दिन पूजा सामग्रियों को लेकर पीपल के वृक्ष के पास भगवान जनार्धन विष्णु की पूजा की जाती है। वट वृक्ष में धागा बांधा जाता है। घी, सिंदूर, कुमकुम, रोली, अक्षत, फूल, धूप दीप, फल, वस्त्र, नैवैद्य आदि से वट वृक्ष की पूजा कर 108 बार फेरी लगाया जाता है। कथा सुना जाता है। हवन, आरती , दान दक्षिणा कर पूजा को पूरा किया जाता है। इस दिन नमकवाला भोजन नही किया जाता है पूजा के बाद सिर्फ फलाहार ग्रहण करें। और अगले दिन सुबह उद्यापन करें।

Somvati Amavasya Puja व्रत सामग्री में क्या क्या लें?

सोमवती अमावस्या पूजा को करने के लिए निम्न प्रकार की सामग्रियों की आवश्यकता पड़ती है। जैसे –

  1. कलश स्थापना के लिए – कलश और ढक्कन मिट्टी का, आम या अशोक के पत्ते , मिट्टी के दिये , रक्षा सूत्र, जल, गंगाजल इत्यादि।
  2. काला तिल या चावल (अक्षत), रोली, कुमकुम, अष्टगन्धक सिंदूर, कलावा, गुलाल, चन्दन, हल्दी इत्यादि
  3. पान- सुपारी, लौंग- इलायची, सिक्का, धूप बत्ती, कपूर, घी, इत्यादि
  4. फूल, बेलपत्र, दुध, दुब, फल, काले चने इत्यादि
  5. प्रसाद- पेड़े, हलवा, पूरी, मेवे इत्यादि।
  6. वस्त्र, उपवस्त्र, चुनरी, श्रृंगार सामग्री इत्यादि।
  7. फेरी के लिए- धागा, 108 धन सामग्री जैसे- सोना, चांदी, विभिन्न बहुमूल्य रत्न, विभिन्न प्रकार के अन्न, विभिन्न प्रकार के फल, सूखे फल, शृंगार सामग्री कुछ भी सामग्री जो 108 कि संख्या में हो।
  8. हवन सामग्री- गूगल, गुड़ इत्यादि।

Somvati Amavasya Puja Vidhi in Hindi,परिक्रमा विधि क्या है?

सोमवती अमावस्या पूजा के दिन नदी या गंगा में स्नान करें या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करके साफ सुथरे कपड़े पहनकर तैयार हो जाए। अब सारे सामग्रियों को इकट्ठा कर लें पीपल के वृक्ष के पास जाए । अच्छे से जगह की सफाई कर वट वृक्ष को स्नान कराएं। प्रणाम करें। अब कलश स्थापना करें।

गेंहूँ से अष्टदल कमल बनाये ,उस पर कलश रखे कलश में जल, गंगाजल डाले, पान सुपारी ,लौंग इलायची, सिक्का, अक्षत, कुमकुम, हल्दी, गुलाल, आम या अशोक के पत्ते डालकर उसपर मिट्टी के ढक्कन रखें। उसमे चावल या तिल भरें। अब कलावे की बत्तिवाला मिट्टी के दिये जलाए।

कलश के पास गौरी गणेश की कुमकुम, सिंदूर, अक्षत, फूल,पान सुपारी धूप इत्यादि से पूजा करें। इसी तरह वट वृक्ष की पुजा करें। फल, प्रसाद, चुनरी,वस्त्र, उपवस्त्र, सभी शृंगार सामग्री चढ़ाएं। दीप, धूप बत्ती जलाएं।

वट वृक्ष की परिक्रमा- वट वृक्ष की 108 प्रकार की सामग्रियों से परिक्रमा किया जाता है। अगर सम्भव नही है तो केवल एक ही प्रकार के 108 सामग्री से भी परिक्रमा करने का प्रावधान है। जैसे – 108 मूंगफली या चूड़ी या बिंदी, फल इत्यादि। लेकिन अगर कोई 108 बार परिक्रमा नही करने पाती है तो वह यथासम्भव 54 बार भी परिक्रमा कर सकती है।

जिसमे सामग्रियों की संख्या दो की संख्या में होना चाहिए यानि 54 जोड़ा सामग्री। यदि कोई 27 बार फेरी लगाती है तो वस्तुओं की संख्या चार की संख्या में हो। इस तरह 108 प्रकार की वस्तुओं की फेरी लगाने से सभी प्रकार के धन का सुख प्राप्त होता है । फेरी लगाने के बाद एक बार जल की फेरी लगाने का नियम है जिसमे जल का धार फेरी करते समय टूटना नही चाहिए।

इस तरह फेरी लगाने के बाद सोमवती अमावस्या पूजा की कथा सुनी जाती है। कथा के बाद अग्निपूजा करें अर्थात अग्नि देव को स्नान कराएं, घी, गुड़ का भोग लगाएं, हवन करें, अग्निदेव को जल अर्पण करें। उसके बाद भगवान गणेश या शिव या विष्णु भगवान की आरती करें। अपने पुरोहित या ब्राह्मण को परिक्रमा की वस्तुएं, फल, वस्त्र, प्रसाद, अन्न, द्रव्य दक्षिणा दान करें या यथासंभव दान करें।

Somvati Amavasya Puja Katha in Hindi

सोमवती अमावस्या पूजा की व्रत कथा विधि इस प्रकार है- एक साहूकार था जो अपने सात बेटे और साथ बहुएं के साथ रहता था उसकी एक लड़की भी थी। जो बहुत ही गुणवती थी। उनके घर एक साधु जी प्रतिदिन भिक्षा मांगने आते थे जिसे साहूकार की पत्नी भिक्षा देती थी। एक दिन जब साधु जी भिक्षा मांगने आये तब उस लड़की ने भिक्षा देने के लिए आगे बढ़ी तभी उस साधु ने उस लड़की से भिक्षा नही लिया और बोले कि तेरे भाग्य में विधवा होना लिखा है।

और ऐसा कहकर चले गए। लड़की को उस साधु की बात पर बहुत गुस्सा आया अगले दिन साधु फिर भिक्षा लेने आया फिर साहूकार की लड़की ही भिक्षा देने बाहर आई लेकिन साधु ने भिक्षा नही लिया और फिर वही बात कहकर चले गए कि तेरे भाग्य में सुहाग की जगह पर दुहाग लिखा है।

तब लड़की ने सारी बात अपनी माँ को बताई । सारी बात सुनकर माँ बोली कि कल जब साधु आएगा तब मैं सुनती हूँ कि ये क्या कहता है और ऐसा क्यों कहता है। अगले दिन साधु फिर आता है तब सहुकर्णी छिपकर बैठ जाती है और लड़की को भिक्षा देने के लिए बाहर भेजती है। लेकिन साधु जी उस लड़की से भिक्षा नही लेते है और फिर वही बात कहते हैं कि तेरे भाग्य में विधवा होना लिखा है।

ऐसा सुनते ही सहुकर्णी बाहर आती है और साधुजी से कहती है कि हम तुम्हें भिक्षा देते हैं और तुम हमे आशीर्वाद देने के बजाय अशुभ बाते कर रहे हो? तब साधु ने कहा कि मैं कोई अशुभ बाते नही कह रहा हूँ, मैं तो वही कह रहा हूँ जो इसके भाग्य में लिखा हुआ है।

साधु की सारी बाते सुनकर सहुकर्णी कहती है कि जब तुम्हे सारी बात पता है तो इससे बचने का कोई उपाय बताइये । तब साधु जी कहते हैं कि सात समुंदर पार एक धोबिन रहती है जिसका नाम सोना है। जो पतिव्रता स्त्री है और सोमवती अमावस्या व्रत बहुत ही निष्ठा से करती है अगर यह लड़की उसकी सेवा करे और वह प्रसन्न होकर अपनी इच्छा से अपना सुहाग इस लड़की को देदे और इसके माथे पर अपना सिंदूर लगा दे तभी इसका दुर्भाग्य टल सकता है अन्यथा विवाह होने के क्रम में फेरों के समय सर्प के काटने से इसके पति की मृत्यु हो जायेगी और यह विधवा हो जायेगी।

सारी बात सुनकर माँ चिंतित हो गयी और रोने लगी। तभी वह लड़की सोना धोबिन की तलाश में सात समुंदर पार जाने की इच्छा कही और उसकी तलाश में निकल पड़ी। चलते चलते रास्ते मे बहुत तेज धूप पड़ रही थी जिससे बचने के लिए लड़की एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गयी। और आराम करने लगी। उसी वृक्ष पर एक गरूड़नी अपने बच्चों के साथ रह रही थी। लेकिन जब वह चारे के लिए घोसले से बाहर जाती एक सर्प आकर उसके बच्चों को खा जाता था।

इस बार भी गरुड़नी के दो बच्चे घोसलें में अकेले थें। तभी वह सर्प आया और गरुड़नी के बच्चों को खाने के लिए लपक रहा था लेकिन उस साहूकार की लड़की ने उस सर्प को मारकर बच्चों की रक्षा की। कुछ देर बाद गरुड़नी आई और चारो तरफ खून देकखकर उसने सोचा कि इसी लड़की ने मेरे बच्चों को मार होगा और वह उस लड़की को चोंच मारने लगी। तब लड़की ने कहा कि एक तो मैंने तेरे बच्चों की सर्प से रक्षा की और तू मुझे ही चोंच मार रही है।

सारी बाते जानने पर गरुड़नी ने खुश होकर वर मांगने को कहा। तब उस लड़की ने कहा कि मुझे सात समंदर पार सोना धोबिन के घर छोड़ दो। तब गरुड़नी ने वैसा ही किया । लड़की वहाँ पहुच तो गयी लेकिन उसने सोचा कि मैं ऐसा क्या करूँ कि सोना धोबिन मुझे सुहागिन होने का आशीर्वाद अपनी इच्छा से देदे।

उधर सोना धोबिन की भी सात बेटे और सात बहुए थी। लेकिन घर के काम को करने के लिए हरदम वे एक दूसरे पर टालती रहती और आपस मे लड़ती झगड़ती रहती थी। तभी जब रात को सोना धोबिन अपने पति, बेटे और बहुएं सहित सो जाते तब वह लड़की चुपके से आती और घर का सारा काम करती और सुबह होने से पहले चली जाती। सारी बहुएं भी आपस भी सोचती कि कौन सब काम कर रही है।

लेकिन यह बात कोई एक दूसरे से नही पूछती थीं। काम करने की बात सोना धोबिन ने भी देखी कि आजकल बहुएं लड़ती झगड़ती भी नही है और काम भी सारा हो जाता है। तब उसने सारी बहुएं को बुलाकर पूछा कि तुमलोग आजकल लड़ती भी नहीं हो और घर का सारा काम कौन कर रहा है। बहुएं सास से झूठ कह देती थी कि लड़ाई करने से क्या फायदा है इसलिए हम मिलकर सब काम कर लेते हैं लेकिन सोना को अपने बहुएं पर विश्वास नही हुआ कि ये लोग मिलकर काम कर रहीं है।

सच जानने के लिए वह एक रात चुपके से कही छुपकर बैठ जाती है कि कौन सी बहु है जो सब काम करती है ? जब रात हुई तो वह देखती है कि एक लड़की चुपके से उसके घर मे आई और सब कार्य करने लगी। यह देख सोना धोबिन खुश हो गयी जब वह लड़की जाने लगी तब सोना धोबिन ने उसे रोका और कहा कि तुम ही रोज मेरे घर का काम करके चली जाती हो तुम सदा सुहागिन रहो बेटी।

लेकिन मुझे यह बताओ कि यह सब मेरे घर मे क्यों कर रही हो। तब उसने कहा कि मेरे भाग्य में तो विधवा होना लिखा है और आपने मुझे सुहागिन होने का आशीर्वाद दिया है। मैं अपने दुहाग को टालने के लिए यह सब कर रही हूँ चूँकि आप सोमवती अमावस्या का व्रत करती हैं अगर आप प्रसन्न होकर अपनी इच्छा से सुहाग का सामान मेरे माथे पर लगा दे तो मेरा दुहाग टल जाएगा।

चूंकि सोना धोबिन उससे प्रसन्न थी और उसे सदा सुहागिन होने का आशीर्वाद भी दे दी थी। इसलिए वह साहूकार की लड़की के साथ उसके विवाह में जाने की इच्छा व्यक्त की। जाते समय सोना धोबिन अपने बेटे और बहुएं से कहीं कि इस लड़की के साथ मैं इसके विवाह में इसे सुहाग देने जा रही हूं लेकिन अगर मेरे जाने के बाद तुम्हारे पिताजी मर जायेंगे तो उन्हें तेल की कूप में डालकर रख देना । उसके बाद सोना धोबिन साहूकार के घर पहुच जाती है साहूकार अपनी बेटी का विवाह करता है। सोना धोबिन भी कच्चा कड़वा, दुप और तार लेकर बैठ जाती है।

तभी फेरो के समय एक सर्प आता है और उस लड़की के पति को डँसने के आगे आता है तो सोना धोबिन ने कड़वा आगे कर तार से सर्प को बांध दिया और सर्प मर गया। उसके बाद सोना धोबिन ने लड़की को अपना मांग का सिंदूर उसके माथे पर लगा दिया और कहा कि जितनी सोमवती अमावस्या व्रत मैं की हूँ उसका सारा फल इस लड़की को मिलेगा और आगे जो मैं सोमवती अमावस्या व्रत करूंगी उसका फल मेरे पति और बेटो को मिलेगा ।

उधर उस लड़की को सुहाग देते ही सोना धोबिन का पति मर जाता है। और यहां सभी लोग सोना और सोमवती अमावस्या की जयजयकार करने लगें। जब सोना धोबिन अपने घर जाने लगी तब साहूकार ने कहा कि तुमने मेरे बेटी को अपना सुहाग दिया है। मेरे जमाई को जीवनदान दिया है। मांगों जो तुम चाहती हो। इसके बदले मैं तुम्हे क्या दूं। तब सोना धोबिन कहती है कि मुझे कुछ नही चाहिए ऐसा कहकर वह अपने घर जाने लगी।

रास्ते मे चलते चलते ही सोमवती अमावस्या का व्रत आ गया। तभी एक औरत मूली की टोकरी लिए बैठी थी। जब उसने सोना धोबिन को देखा तो उसने कहा क्या तुम यह बोझ मेरे सिर पर रख दोगी। सोना ने कहा नही माई आज सोमवती अमावस्या है आज मैं मूली का स्पर्श नही करती और वह आगे बढ़ गयी, तभी एक लड़की रुई का बोझ लिए बैठी थी उसने भी सोना धोबिन से बोझ को सिर पर रखने के लिए कहा सोना धोबिन ने कहा नही आज सोमवती अमावस्या है मैं रुई का स्पर्श नही करूंगी और वह आगे बढ़ गयी । चलते चलते वह एक पीपल के वृक्ष के पास बैठ कर उस वृक्ष के साथ अपनी साहूकार वाली पूरी कहानी बताई।

और कहा कि अब मैं जो सोमवती अमावस्या व्रत करूंगी उसका फल मेरे पति और बेटों को मिलना चाहिए। इसके बाद उसने व्रत किया पीपल वृक्ष की 108 खीरों के साथ प्रदक्षिणा की । इसलिए इसे प्रदक्षिणा व्रत भी कहते हैं। उसके बाद सोना धोबिन अपने घर आई तो उसने देखा कि उसका पति मरा पड़ा है। तब रास्ते मे उसने जो सोमवती अमावस्या व्रत की थी उसका फल अपने पति को दे दिया जिसके प्रभाव से वह पुनः जीवित हो गया ।

तभी सब कहने लगे कि ऐसे तुम्हें कैसे किया ,तुमने क्या किया कि तुम्हारा पति जीवित हो गया। तब वह कहती है कि मैंने तो ऐसा कुछ भी नही किया बस रास्ते मे सोमवती अमावस आ गई थी इसलिए इसका मैने व्रत किया अपनी बीती कहानी बताई पीपल वृक्ष की 108 खीरों के साथ परिक्रमा किया ।

उसी के प्रभाव से खुश होकर नाथ ने इन्हें जीवनदान दे दिया। इसके बाद लोगों ने सारे इलाको में यह बात फैला दी कि जो स्त्री सोमवती अमावस के दिन व्रत करके पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमा करेगा और प्रार्थना करेगा कि हे सोमवती अमावस जैसे तुमने साहूकार की लड़की और सोना धोबिन को सुहाग दिया वैसे ही हमे भी देना। ऐसा करने से अखण्ड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। तभी से सोमवती अमावस्या पूजा का प्रचलन पूरे संसार मे होने लगा।

सोमवती अमावस्या पूजा दक्षिणा दान और व्रत का पारण कैसे करें?

सोमवती अमावस्या पूजा सम्पन्न होने के बाद यथासंभव दान किया जाता है। कुछ लोग फेरी में प्रयोग किये गए सारी वस्तुए दान करते हैं तो कुछ लोग आधी वस्तु दान करते हैं। सोमवती अमावस्या पूजा के बाद पारण करने से पहले ही आटे, चावल, हल्दी, नमक, घी, मिर्च, वस्त्र, पैसे इत्यादि किसी भी ब्राह्मण को दान देना चाहिए। बिना दान के पूजा सफल नहीं माना जाता हैं इसलिए दान अवश्य करना चाहिए।

इस दिन पूजा के बाद सिर्फ एक बार बिना नमक, तेल इत्यादि का बना शुद्ध भोजन करना चाहिए। अगले दिन सुबह में स्नान करें , घर या मंदिर में पूजा करे फिर दान की वस्तुएं निकालकर ही अन्न ग्रहण करें।

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