Navratri Special- पहला दिन माँ शैलपुत्री की कथा एवं पूजा विधि

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Navratri First Day Maa Shailputri Katha and Puja Vidhi- हेलो दोस्तों गंगा ज्ञान पर आपका फिर से स्वागत है, आज हम बात करेंगे शारदीय नवरात्र के पहले दिन होने वाले माँ शैलपुत्री की कथा एवं पूजा विधि के बारे में। जैसा कि हम सभी जानते है शास्त्रों के अनुसार हिन्दू धर्म मे नवरात्रि माँ भगवती की आराधना, साधना और सिद्धि का दिव्य समय है । इस समय में माँ दुर्गा के नौं रूपो की पूजा- अर्चना की जाती है।

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नवरात्र के सबसे पहले दिन को एकम यानी प्रथम माना जाता है और इस दिन कलश स्थापना एवं माँ शैलपुत्री की पूजा-अर्चना एवं पाठ किया जाता है। आज के इस पोस्ट में हम बात करने वाले है माँ शैलपुत्री के पाठ एवं पूजा विधि के बारे में तो चलिये शुरू करते है।

माँ शैलपुत्री पूजा का ज्योतिष महत्व

जिनके कुंडली मे चंद्रमा निर्बल है वे यदि माँ शैलपुत्री की आराधना करते है तो उनके लिए यह अति उत्तम होता है, क्योंकि माँ शैलपुत्री के माथे पर अर्धचंद्रमा वीराजीत है। माँ शैलपुत्री के दाहिने हाथ मे त्रिशूल जो मनुष्य के कुनडली में बैठे छठे भाव जो शत्रु भाव होता है उसे भी निर्बल बनाता है, एवं बायें हाथ में कमल पुष्प विराजित है जो कुंडली के अंतिम भाव द्वादश भाव को भी बलिष्ट करती है।

Maa Shailputri Mantrochar 

माँ शैलपुत्री की पूजा अर्चना के समय इन मंत्रोचार का प्रयोग किया जाता है।

माँ शैलपुत्री का स्त्रोत पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

वंदना मंत्र

वन्दे वाञि्छतलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्।।

इस मंत्र को(108) बार क्रिस्टल की माला से शुद्ध उच्चारण करें।।

माँ शैलपुत्री का पूजाफल

Maa Shailputri देवी की सहज भाव से ही पूजा-अर्चना करने पर प्रशन्न हो जाती है और अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरा कर देती है। यदि आपकी आत्मबल में कमी हो या मन अशांत हो तो माँ शैलपुत्री देवी की आराधना करने से लाभ मिलता है।

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माँ शैलपुत्री जी की आरती 

शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।

पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।

सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।

घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।

जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।
मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।

माँ शैलपुत्री देवी की कथा

माँ शैलपुत्री देवी पार्वती देवी का ही स्वरूप है पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा इनके पूर्व जन्म में इनका नाम सती था उस समय ये प्रजापति दक्ष की कन्या थी। इनका विवाह भगवान शिव जी से हुआ था। एक बार की बात है प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ का आयोजन किया जिसके दौरान उन्होंने सभी देवी देवताओं को इस यज्ञ में आमंत्रित किया परंतु उन्होंने शिव जी को आमंत्रित नही किया, जब माता सती को यह पता चला कि उनके पिता एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन कर रहे है तो उनका वहाँ जाने का बहुत मन किया तो उन्होंने यह बात भगवान शिव जी को बताई तब शिव जी ने कहा कि, देवी लगता है प्रजाति दक्ष किसी कारण से हमसे नाराज है उन्होंने इस यज्ञ में सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया है परंतु जानबूझकर हमें आमंत्रित नही किया ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहा जाना उचित नहीं होगा परन्तु देवी सती नहीं मानी तब भगवान शंकर ने देवी सती को वहाँ जाने की अनुमति देदी।

देवी सती जब अपने पिता के घर पहुंची तो उन्होंने देखा कि कोई भी उनसे प्रेम आदर से बात नहीं कर रहा था उनकी बहनो की बातों उपहास के भाव भरे हुए थे, केवल उनकी माता स्नेह से उन्हें गले लगाया। देवी सती अपने परिजनों का यह व्यवहार देख कर बहुत दुखी हुईं, उन्होंने सोचा की भगवान शंकर जी की बात न मान कर बहुत बड़ी गलती कर दी वे अपने पति का यह अपमान सह न सकी और उसी क्षण अपने इस रूप को अग्नि में जलाकर भस्म कर दिया, उधर शंकर जी इस दुःखद घटना को सुनकर क्रोध में अपने दूतों को भेजकर राजा दक्ष के उस यज्ञ का विध्वंश करा दिए, सती ने अपने इस रूप को अग्नि में जलाकर अगले जन्म में माँ शैलपुत्री नाम से विख्यात हुई।

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