Kartik Snan की कथा एवं फायदें कार्तिक स्नान क्यों किया जाता है

Kartik Snan Ki Katha and Vidhi- हेलो दोस्तो गंगाज्ञान पर आप सब का फिर से स्वागत हैं। आज के इस पोस्ट में हम आपको Kartik Snan Ki Kahani कथा एवं Fayade क्यों लोग करते है कार्तिक स्नान के बारे में बताने वाले हैं अगर आप भी जानना चाहते हैं कार्तिक स्नान की कहानी कथा एवं फायदें क्यों लोग करते है कार्तिक स्नान के बारे में तो आप हमारे इस पोस्ट को जरूर पढ़ें और अपने दोस्तों के साथ शेयर करें।

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साल के 12 महीनों में से कार्तिक मास सबसे उतम और पवित्र माना गया हैं। पुराणों के अनुसार बइस मास में भगवान विष्णु नारायण के रूप में जल में निवास करते हैं। इसलिए कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक नियमित सूर्योदय से पहले नदी या तलाब स्नान करना दुध से स्नान का पुण्य देता हैं।

धार्मिक दृष्टि से इस माह का महत्व इसलिये भी हैं क्योंकि इसी माह में कुमार कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया था। कुमार कार्तिकेय के पराक्रम को सम्मान देने के लिये भी इस माह का नाम कार्तिक रखा गया हैं। शरद पूर्णिमा के अगले दिन कार्तिक मास की 1ादशी से पूर्णिमा तक कार्तिक स्नान किया जाता है कार्तिक स्नान में स्नान करने वाले सवेरे जल्दी उठकर स्नान करके मन्दिर में पूजा करते हैं और कार्तिक मास की कहानी सुनते हैं।

कार्तिक स्नान की कहानी एवं कथा

कार्तिक स्नान की कथा इस प्रकार है एक समय की बात है एक बूढ़े बाबा थे जिनकी दो बहुएं थी और दोनों बहू मिलकर ससुर जी का काम करती थी अब कार्तिक मास आया तो ससुर जी कहने लगे बहू में कार्तिक नहाना चाहता हूँ तो बड़ी बहू ने सुनते ही मना कर दिया कहा आपका Kartik Snan का काम मुझसे नहीं होगा आप छोटी बहू से कह दें तो ससुरजी छोटी बहू के पास गए और कहने लगीं बहू में कार्तिक नहाना चाहता हूँ छोटी बहुत सीधी सादी थी उसने कहा जी पिताजी आप बताइये मुझे क्या करना होगा तो ससुर जी कहने लगे ज्यादा कुछ नही करना बेटा रोज मेरे नहाने के लिए पानी भर देना मेरी धोती धोकर सुखा देना है।

और दोपहर का खाना बना देना अब छोटी बहू रोज सुबह पांच बजे उठकर कुएं से पानी भरकर ला देती थी। जिससे ससुर जी स्नान कर लेते उनकी धोती धोकर सुखा देती और दोपहर में ससुर जी को गरम गरम रोटी बनाकर खिला देतीं जब छोटी बहू ससुर जी की धोती धोकर सुखाती तो उसमें से गिरने वाली पानी की बूंदें वहां मोती के रूप में इकट्ठी हो जाती थी पर छोटी बहू इतनी नादान थी कि वह समझ नहीं पाती थी और रोज सुबह झाड़ू लगाकर आंगन में एक तरफ मोती का ढेर लगा देती थी इस तरह से एक माह निकल गया।

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अब कार्तिक महीना ख़त्म होने आया तो ससुर जी ने कहा बहू में कार्तिक समाप्त होने से पहले 24 ब्राह्मणों को खानाखिलाना चाहता हूँ छोटी बहू बोली पिताजी मैं खाना बना देती हूँ और फिर आपको खेत से बुला लाऊंगी बहू खाना बनाकर ससुर जी को खेत में बुलाने जाती है और कहती है पिताजी मैंने खाना बना दिया है आप घर जाकर ब्राह्मणों को खाना खिला दीजिये और मैं खेत की रखवाली कर लेती हूं। यह सुनते ही पिताजी घर चले जाते हैं अब छोटी बहुत सोचती है कार्तिक महीने में ब्राह्मणों को तो खाना खिला रहे हैं और चिड़ियाओं को उड़ा रहे हैं रामजी की चिडिया राम जी का खेत यह सोचकर वे चिड़िया को दाना खाने देती है और चद्दर तान कर सो जाती है जब चिड़िया दाना चुग रही होती है तो जो दाने जमीन पर गिरते हैं वह हीरे मोती बन जाते हैं।

धीरे धीरे उनका पूरा खेत हीरे मोती से जगमगाने लगता है पास ही में बड़े भाई का खेत था वह देखता है कि छोटे भाई का खेत हीरे और मोतियों से जगमगा रहा है बड़े बेटे से रहा नहीं गया और वह अपने पिताजी से पूछता है इसका क्या कारण है पिताजी कहते हैं बेटा हम पर तो कार्तिक महाराज की कृपा हुई है। बड़ा भाई जाकर अपनी पत्नी को सारी बात बताता है उसकी पत्नी के मन में लालच आ जाता है और वह मन ही मन सोचती है ससुर जी ने तो पहले मुझसे कहा था मैंने क्यूँ मना कर दिया अब वह साल भर इन्तजार करती है और जब Kartik Month आने वाला होता है तो जाकर ससुर जी से कहती है पिताजी आप इस बार कार्तिक स्नान नहीं करेंगे ससुरजी कहते हैं बेटा इस बार में कार्तिक स्नान नहीं करना चाहता अब मेरी उमर हो गयी है तो बड़ी बहू चिढ़ जाती है और गुस्से में कहने लगती है आपने छोटी बहू को तो मालामाल कर दिया अब मेरी बारी आई तो कहते हैं मेरी उमर हो गयी है नहीं पिताजी आपको कार्तिक स्नान करना ही होगा।

सुरजी थक हार कर हाँ कर देते है बड़ी बहू हीरे मोती के लालच में ससुर जी का बहुत ख्याल रखतीं सवेरे कुएं से पानी लाकर उनके लिये भर देतीं उनकी धोती धोकर सुखा देती थी। धोते सुखाते वक्त उसे निचोड़ती नहीं थी जिससे ज्यादा पानी गिरे और ज्यादा मोती इकट्ठे हों उस पानी से कोई हीरे मोती तो नहीं बने पर जमीन में गड्ढे जरूर हो गए। इधर कार्तिक महीना ख़त्म होने आया उसने पिताजी से कहा पिताजी एकबब्राह्मण को न्यौता दे देती हूं।अब वह जल्दी से खाना बनाकर ससुर जी को बुलाने खेत पर चली गई और खुद खेत की रखवाली करने लगीं। खेत में कोई भी चिड़िया दाना चुगने आती तो वह उसे भगाकर कहती कोई भी एक भी दाना मत खाओ अभी ये सब मेरे हीरे मोती बनने वाले हैं।

धीरे धीरे शाम हो गई शाम तक उसके खेत में कोई हीरे मोती के ढेर नहीं बने बल्कि उसकी बालियों में दाने भी नहीं रहे तो वह ससुर जी के पास लडऩे पहुंची तब ससुरजी ने कहा कि बहू तूने तो देखा देखी के लालच में मेरी सेवा की जबकि छोटी बहू ने तो निस्वार्थ भाव से मेरी सेवा की इसीलिए उसे कार्तिक महाराज की कृपा मिली और तूने देखा देखी करीब लालच करा तो तेरी फसल भी खराब हो गई है। कार्तिक महाराज को छोटी बहू ने निस्वार्थ भाव से सेवा की तो उसे वैसा ही फल मिला और बड़ी बहू ने लालच के कारण किया इस लिए जो था वह भी चला गया।

Kartik Snan Se Hone Wale Laabh

कार्तिक माह के महत्व में बताया गया हैं कि एक गणिका थी। जब जवानी ढलने लगी तो उसे मृत्यु और उसके बाद कि स्थिति का विचार परेशान करने लगा। एक दिन वह एक ऋषि के पास गई और अपने मुक्ति का उपाय पूछी। ऋषि ने गणिका को कार्तिक स्नान का महत्व बताया। गणिका हर दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करके तट पर दीप जलाकर भगवान विष्णु और सूर्यदेव की पूजा करने लगी और इस पुण्य के प्रभाव से जब उसकी आखरी सांस चलने लगी और उसके प्राण निकलने लगे तो बिना कष्ट के निकल गए और दिव्य विमान पर बैठ कर बैकुण्ठ चली गई।

कार्तिक में दान का महत्व

कार्तिक मास का महत्व का वर्णन करते हुए भागवान श्री कृष्ण ने सत्यभामा को बताया था कि वह पूर्व जन्म में भगवान विष्णु की पूजा किया करती थी। जीवन भर कार्तिक मास में सूर्योदय से पूर्व स्नान करके वह तुलसी माता को दीप दिखती थीं। इस पुण्य से सत्यभामा श्री कृष्ण की पत्नी हुई। भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि कार्तिक का महीना सभी माह से प्रिय हैं। जो भी व्यक्ति इस महीने में अन्नदान,दीपदान करता हैं उस पर कुबेर महाराज भी कृपा करते हैं।

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