Aham Brahmasmi in Hindi, Aham Brahmasmi Means पुरी जानकारी हिन्दी में |

Aham Brahmasmi in Hindi नमस्कार दोस्तों, गंगाज्ञान पर आप सबों का फिर से स्वागत है । दोस्तो, इस सांसारिक जीवन मे व्यक्ति जब मरनाशन के करीब रहता है तो मरने के पहले वह मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर का वरण करता है। मरने से पहले मनुष्य परमात्मा को अपने अंदर महसूस करता है। जो ऐसा करता है चाहे वो कितना भी गलत क्यों न किया हो अगर वह मरते समय सारी सांसारिक चीजो पर से ध्यान, मोह, लोभ, माया, वासना, इच्छा, चिंता को भूलकर सिर्फ ईश्वर का वरण करता है तो पापी होने के बाद भी उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। और परमात्मा के चरणों मे जगह मिलती है। अगर कोई भी प्राणी अंतिम क्षणों में सांसारिक चीजो का मोह, लोभ, चिंता, वासना की भावना, ईर्ष्या इत्यादि का ध्यान अपने मन मे रखता है तो उसका पुनर्जन्म भी इसी के अनुसार इस सांसारिक जीवन मे हो जाता है उसे ईश्वर की शरण नही मिलती है अर्थात मोक्ष नही मिलता है।

Aham-Brahmasmi

इस पोस्ट में वेदान्त के चार सर्वश्रेष्ठ महावाक्य में से “अहं ब्रह्मस्मि” के बारे में बात करने जा रहे हैं अहं ब्रह्मस्मि क्या है?What is Aham brahmasmi? अहं ब्रह्मस्मि का हिंदी शब्दार्थ, भावार्थ क्या होता है । “अहं ब्रह्मस्मि” की पूरी जानकारी हम इस पोस्ट के माध्यम से बताने की पूरी कोशिश करने का प्रयास करेंगे ताकि आपको “अहं ब्रह्मस्मि’ के बारे में जानकारियां बिल्कुल समझ मे आ सके। तो चलिए जानने का प्रयास करते है अहं ब्रह्मस्मि के बारे में ….

Aham Brahmasmi जानने से पहले यह भी जाने (वेदों के चार महावाक्य)

भारतीय संस्कृति और उपनिवेषदों के अनुसार वेद चार प्रकार के होते हैं- ऋग्वेद, अर्थवेद, सामवेद और यजुर्वेद। प्रारभिक दौर में ऋग्वेद के बहुत ही महत्व था उसके अनुसार ऋग्वेद के महावाक्य “प्रज्ञानं ब्रह्म” का पाठ पढ़ाया जाता था। साध्वी लोग इसी मंत्र का जाप करते थे। “प्रज्ञानं ब्रह्म” अर्थात सब मे परमात्मा का वास होता है। जिसका भावार्थ होता है- जो ईश्वर है जो परमात्मा है वो हर जगह है जो भी दिखाई दे रहा है उसमे परमात्मा का वास है। इस मंत्र की साधना करने वालों के मन मे धीरे धीरे यह प्रश्न आया कि जब परमात्मा हर जगह है तो हम क्या हैं? तो इसके लिए सामवेद में इस महावाक्य को रचा गया- “तत त्वम असि” अर्थात तुम भी वही हो।

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तुममे भी परमात्मा है। फिर कुछ समय तक इसी मंत्र का पाठ पढ़ाया जाने लगा। इस महावाक्य पर साधना करते करते साधको के मन मे यह प्रश्न आया कि जब हम में भी परमात्मा है तो हमारे शरीर मे कहा हैं?, शरीर के किस भाग में हैं? हाथ मे, पैरों में, सिर मे कहा ? जो ब्रह्म है हमारे शरीर मे क्या ब्रह्म है? तो इसके लिए अर्थवेद में इस महावाक्य को रचा गया – “अयं आत्मा ब्रह्म । अर्थात हमारा आत्मा ब्रह्म है। हमारे अंदर जो आत्मा है वह ब्रह्म है। आत्मा के अंदर परमात्मा का वास है। और हमारा शरीर में आत्मा का वास है। फिर कुछ समय तक इसी महावाक्य पर साधक लोग साधना किये। लेकिन बाद में धीरे धीरे यह विचार आया कि जब हमारी आत्मा ब्रह्म है तो क्या हम भी ब्रह्म है? जब आत्मा में परमात्मा है और आत्मा हममें है तो क्या हम भी परमात्मा हैं? तो फिर इस बात को समझने के लिए यजुर्वेद में इस महावाक्य को रचा गया – “अहं ब्रह्मस्मि “। गुरु आदिशंकराचार्य ने अद्वैत वेदान्त में इस महावाक्य के बारे में विस्तार से वर्णन किया किया है । क्या है “अयं ब्रह्मस्मि” चलिए विस्तार से जानने का प्रयास करते है-

 Aham Brahmasmi Meaning (अहं ब्रह्मस्मि शाब्दिक अर्थ)

“अहं ब्रह्मास्मि ” उपनिवेषदों के चारो महावाक्य मे से एक महावाक्य है। जो यजुर्वेद से लिया गया है यह अद्वैत वेदान्त का सार है इसका वर्णन आदिशंकराचार्य ने यजुर्वेद में किया है। “अहं ब्रह्मस्मि”(Aham Brahmasmi ) जो कि संस्कृत वाक्य है जिसका शाब्दिक अर्थ इस प्रकार है-

अहं – “अहं” शब्द का हिंदी अर्थ मैं होता है मैं अर्थात स्वयं का अभिमान। मैं आत्मा से बोध कराता है। मैं आत्मा हूँ । शरीर क्या है? शरीर तो नाशवान है शरीर अलग अलग हो सकता है इससे कोई फर्क नही पड़ता ऐसा मानना चाहिए क्योंकि आत्मा अविनाशी है अजर – अमर है,सनातन है, प्रकाशरूप है अर्थात मैं आत्मा हूँ न कि शरीर । ना लोग मुझे मेरे नाम से जानते है और न मैं अपने नाम से जाना जाता हूँ न मैं इस संसार मे हूँ न मुझे किसी प्रकार का लोभ, भय, चिंता है । अर्थात मैं अपने व्यक्त्वि को अपने आत्मनिर्भरता को महत्व देता हूँ ।

“ब्रह्म” – यहाँ ब्रह्म में केवल एक रेखा है एक लाइन है इसका अर्थ परम् पिता ब्रह्मा नही होता है। ब्रह्मा में दो रेखा होती है दो लाइन होता है जैसे ब्रह्म और ब्रह्मा । ब्रह्म में एक लाइन और ब्रह्मा (परम् पिता ब्रह्मा) में दो लाइन है आप यहाँ दोनो में अंतर देख सकते हैं ।

यहाँ ब्रह्म का अर्थ सिर्फ एक प्रकार का तुलनात्मक है। जो इस प्रकार है- ब्रह्म अर्थात सर्वशक्तिमान जो सर्वज्ञ है जो सबके अंदर है जो सबमे है अर्थात रचयिता, creater । ब्रह्म से अभिप्राय उस शक्ति से है जिससे सबकुछ उत्पन्न किया जा सकता है या सबकुछ creat किया जा सकता है जिसे करने की क्षमता हर व्यक्ति के अंदर होता है यहां तक कि ईश्वर भी उत्तपन्न (पैदा) कर सकता है वह शक्ति क्या है वह ब्रह्म शक्ति है मैं, तुम, सब सर्वशक्तिमान है ब्रह्म है। ब्रह्म क्या है ब्रह्म परमात्मा है । परमात्मा का वास हमारी आत्मा में है। अर्थात आत्मा ही परमात्मा है।

“अस्मि”- अस्मि का अर्थ हूँ होता है । हूँ आत्मा के होने का भाव है। आत्मबल है। अपने होने का संकल्प,समझ है। अपने रचयिता होने के अस्तित्व को महसूस करना ही “अस्मि” है।

“अहं ब्रह्मस्मि” का शाब्दिक अर्थ “मैं ब्रह्म हूँ” होता है । मै परमात्मा हूँ, परमात्मा का वास मेरी आत्मा में है अर्थात आत्मा परमात्मा है। और मैं इधर उधर परमात्मा को ढूंढता फिरता हूँ वो तो मेरी आत्मा में है। “अहं ब्रह्मस्मि ” मैं ब्रह्म हूँ का अर्थ अपने अंदर छुपी आत्मा और आत्मा के अंदर छुपे परमात्मा को अनुभव करना है।

Aham Brahmasmi Means (अहं ब्रह्मस्मि का भावार्थ)

यजुर्वेद का महावाक्य अहं ब्रह्मस्मि ” के बारे में उपनिवेषदों और गुरु आदिशंकराचार्य ने बहुत ही सरल अर्थो में बताया है। इस महावाक्य “अहं ब्रह्मस्मि ” के माध्यम से यह बताने की कोशिश करना है कि कोई भी व्यक्ति अपने मन में किसी भी प्रकार का अंधविश्वास या विभ्रम उत्पन्न न होने दें कि वह एक तुच्छ प्राणी है। बहुत सारे लोग गलत फहमी का शिकार हो जाया करते हैं वे किसी व्याख्याकारों के कहे कथन पर सिर्फ चलते हैं उसे महान और अपने आप को छोटा, तुच्छ प्राणी मान बैठते हैं व्यक्ति किसी महापुरुष के प्रवचन को अपनाते हैं किसी पंडित, पादरी साधु-संत, मौलवी इत्यादि को महत्व देते हैं जबकि वे भी उसी व्यक्ति की तरह थे वे जैसा हैं वैसा हर कोई बन सकता है इसलिए ऐसे व्यक्तियों को महत्व देने के बजाय लोगों को अपने अस्तित्व को जगाना चाहिए। गुरु आदिशंकराचार्य “अहं ब्रह्मस्मि” के माध्यम से लोगो को अपने अस्तित्व को जगाना चाहते है -उठो और जागो और जो भी श्रेष्ठ है उसे तुम करो या करने का प्रयास करो । मनुष्य तुम यह मान लो मैं रचयिता हूँ, अर्थात मैं कर सकता हूँ ऐसा रच सकता हूँ । I am creater।

यहां इन सब का मतलब अपने आप को creat करना से है एक व्यक्ति के पास सर्वश्रेठ क्या है व्यक्ति की आत्मा उसका व्यकित्व ही सर्वश्रेष्ठ है। इसके लिए सबसे पहले व्यक्ति को अपने सर्वशक्तिमान (ब्रह्म) होने की दृढ़ता को महसूस करना चाहिए । यजुर्वेद का यह महावाक्य “अहं ब्रह्मस्मि” हमे यही एहसास दिलाना चाहता है कि हर मानव व्यक्ति स्वयं संप्रभु है। उसके अन्दर ही ईश्वर है

अहं ब्रह्मस्मि का भावार्थ – जिस प्रकार एक हिरन अपने अंदर छुपे कस्तूरी की खुशबू को इधर उधर ढूढता है मगर कस्तूरी तो उसके ही अंदर मौजूद होता है। मैं भी हिरन की भांति अपने अंदर छिपे परमात्मा को इधर उधर ढूंढता फिरता है मगर वह परमात्मा तो मेरी आत्मा में वास करता है। “अहं ब्रह्मस्मि” (मैं ब्रह्म हूँ ) अर्थात अपने अंदर परमात्मा को अनुभव करता हूँ। मेरे अंदर ब्रह्मांड की सारी शक्तियां निहित है मैं ब्रह्मा का अंश हूँ। इस गोपनीय तथ्य का वरण करके यदि मनुष्य अपने जीवन के परम स्थिति का अनुभव कर लें तो उसका जीवन सफलता पूर्वक निर्वाह हो जायेगा।

Aham Brahmasmi Tattoo

एक प्रकार का संस्कृत महावाक्य से बना टैटू है। इसमें लोग अपने शरीर के किसी भी अंगों पर हाथ पैर पीठ कही भी इस मंत्र ॐ अहं ब्रह्मस्मि को छपवाते हैं यह किसी भी भाषा मे और किसी भी डिज़ाइन में छपवाया जा सकता है। आजकल इस टैटू को लोग बड़े पैमाने पर अपनाकर प्रभुत्व को ग्रहण कर रहे है। इस मंत्र के माध्यम से व्यक्ति ईश्वर को अपने अंदर अनुभव करता है । अहं ब्रह्मस्मि टैटू का डिज़ाइन इस प्रकार देखने को मिलता है जिसे लोगो द्वारा अपनाया गया है–

Aham brahmasmi mantra का प्रयोग

अहं ब्रह्मस्मि मंत्र जो कि संस्कृत में लिखा हुआ यजुर्वेद का महावाक्य है इसे मंत्र उच्चारण करते समय ॐ अहं ब्रह्मस्मि बोलकर किया जाता है। इस मंत्र को व्यक्ति आसन्न ग्रहण कर अपने मस्तिष्क को एकाग्र कर सम्पूर्ण ध्यान परमात्मा की ओर केंद्रित करके साधना करता है। इस मंत्र का उच्चारण 108 बार अवश्य करना चाहिए। इस मंत्र से जीव अपने अंदर परमात्मा को अनुभव करता है। इस मंत्र द्वारा जीव और परमात्मा में एकता का एहसास होता है। इस मंत्र का प्रयोग करके अगर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन की परम् स्थिति का अनुभव करले तो उसका जीवन सफलतापूर्वक व्यतीत हो जायेगा और उसे ईश्वर की शरण में जगह प्राप्त हो जाएगा। यह मंत्र उच्चारण सहित इस प्रकार है – 108 बार – ॐ अहं ब्रह्मस्मि ।

Aham Brahmasmi Song

अहं ब्रह्मस्मि song lyrics मूवी kisna से लिया गया है जो हम आपको बताने जा रहे हैं। इस song के गायक सुखविंदर सिंह और गायिका अल्का याग्निक है। इस song
के म्यूजिक डायरेक्टर A. R. रहमान और Ismail darbar हैं। यह song Javed Akhtar द्वारा लिखा गया है। जो इस प्रकार है-

मुझ में शिव हैं, मुझमे ब्रह्म

मुझमे विष्णु, मुझमे कृष्ण

फिर मैं कहे मंदिर जाऊं

धरती अम्बर पर्बत सागर

मैं जीत देखूं उसको पाऊं

फिर मैं काहे मंदिर जाऊं

मुझमे शिव हैं,मुझमे ब्रह्म

मुझमे विष्णु, मुझमे कृष्ण

फिर मैं काहे ………..

धरती अम्बर ………. फिर मैं काहे ….

ये सृष्टि उसका सपना , हर कोई उसका अपना

भगवान को जो पाना है, प्रेम की ही माला जपना

सांस सांस हर धड़कन धड़कन, प्रेम गीत ही गाता जाऊं

फिर मैं काहे ………, मुझमे शिव है…….

फिर मैं काहे …………सुनकर बंशी का लहरा, राधा तोड़े हर पहरा

जमुनाजी के पार चली, रोके लाख भवँर गहरा

राधा ने जो रूप लिया था, आज अगर मैं वो अपनाऊं

फिर मैं काहे………..

मुझमे शिव हैं, मुझमे ब्रह्म

मुझमे विष्णु, मुझमे कृष्ण

फिर मैं काहे ……….

धरती अम्बर पर्बत सागर, मैं जीत देखूं उसको पाऊं फिर मैं काहे मंदिर जाऊं ।

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